यह कविता हमारे समाज में खास कर शहरी समाज में विद्यमान उस वर्ग की दयनीय स्थिति को रेखांकित करती है, जिसे मार्क्सवाद ने सर्वहारा वर्ग और पूँजीपति में विभक्त किया है।
माँ_(बबुआ हमार आ गइल).. संस्मरणात्मक हिन्दी कविता_संदीप कुमार
प्रस्तुत वाचिक कविता मेरे (संदीप कुमार) द्वारा लिखित भावनात्मक कविता है। यह कविता वास्तव में मेरे जैसे तमाम विद्यार्थियों और उन तमाम लोगों की भावनाओं को व्यक्त करती हैं, जो अपने माँ और मातृभूमि से दूर रहते हैं। उन्ही भावनाओं को मैंने रखने का प्रयास किया हूँ।
26 Aug 2021
कविता : विस्थापन (अफ़गानिस्तान के संदर्भ में)
यह कविता मानवीय मूल्यों, मानवाधिकार का दमन करने वाले उन ताकतवर आततायियों के आतंक से अपने सरजमीं को छोड़ने को मजबूर उन अफ़ग़ानी जनता के दर्द को प्रदर्शित करता है, और न केवल यह कविता अफ़ग़ान आवाम के दर्द को ही प्रदर्शित करता।बल्कि उन सभी लोगों को, जो इस तरह के तख्तापलट के कारण अपने जन्मभूमि से विस्थापित होने के लिए मज़बूर होते हैं उनकी भावनाओं को भी तारतम्य करता है ।
26 Aug 2021
मैले-कुचैले चिथड़े में लिपटा आम इंसान
यह कविता हमारे समाज में खास कर शहरी समाज में विद्यमान उस वर्ग की दयनीय स्थिति को रेखांकित करती है, जिसे मार्क्सवाद ने सर्वहारा वर्ग और पूँजीपति वर्ग में विभक्त किया है।
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