दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल: भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दआ ।
मौत ने तो धर दबोचा एक चीते कि तरह
ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रखकर छुआ ।
गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही
पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ ।
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क्या वज़ह है प्यास ज्यादा तेज़ लगती है यहाँ
लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुँआ ।
आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को
आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला ।
इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो
जब तलक खिलते नहीं ये कोयले देंगे धुँआ ।
दोस्त, अपने मुल्क कि किस्मत पे रंजीदा न हो
उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ ।
इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं
8 Jul 2022
भगत सिंह ने जब काउंसिल हाउस में बम फेंका, कैसे की थी तैयारी
उस ज़माने में काउंसिल हाउस जो कि आज का संसद भवन है, का शुमार दिल्ली की बेहतरीन इमारतों में किया जाता था.
काउंसिल हाउस में सेफ़्टी बिल पेश होने से दो दिन पहले 6 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त काउंसिल हाउस के असेंबली हॉल गए थे ताकि ये जायज़ा लिया जा सके कि पब्लिक गैलरी किस तरफ़ हैं और किस जगह से वहाँ बम फेंके जाएंगे.
वो ये हर क़ीमत पर सुनिश्चित करना चाहते थे कि उनके फेंके गए बमों से किसी का नुक़सान न हो. हाँलाकि 'ट्रेड डिस्प्यूट बिल' पास किया जा चुका था जिसमें मज़दूरों द्वारा की जाने वाली हर तरह की हड़ताल पर पाबंदी लगा दी गई थी, लेकिन 'पब्लिक सेफ़्टी बिल' पर अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल ने अभी तक अपना फ़ैसला नहीं सुनाया था. इस बिल में सरकार को संदिग्धों को बिना मुक़दमा चलाए हिरासत में रखने का अधिकार दिया जाना था.
4 Jul 2022
अमृता प्रीतम की कुछ कविताएं
एक घटना
तेर याद
बहत दन बीते ु
जलावतन हु
जीतीं ह या मर गयीं-
कु छ पता नहं
िसफ' एक बार एक घटना हई थी ु
*याल+ क
रात बड़ गहर थी
और इतनी ःत0ध थी
क प2ा भी हले
तो बरस+ के कान च6क जाते..
फर तीन बार लगा
जैसे कोई छाती का 9ार खटखटाये
और दबे पांव छत पर चढ़ता कोई
और नाखून+ से
पछली दवार को कु रेदता…..
तीन बार उठ कर
म ने सांकल टटोली
अंधेरे को जैसे एक गभ' पीड़ा थी
वह कभी कु छ कहता
और कभी चुप होता
?य+ अपनी आवाज को दांत+ म दबाता
फर जीती जागती एक चीज
और जीती जागती आवाज
“म काले कोस+ से आयी हंू
ूहAरय+ क
आंख से इस बदन को चुराती
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