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lemesayOlife@amitbhanu

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by MicInkMusafir (Amitbhanu)

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Podcast Overview

Hello! I'm Amitbhanu, a passionate writer and creative thinker who loves to blend storytelling with innovation. Here you can explore some of my key projects that showcase my creativity and vision. Dive in and enjoy! Welcome to MicInkMusafir—a journey through stories, melodies, and musings. Here, I merge my passions for podcasting, writing, music, and travel to bring you content that resonates. Join me as we explore narratives that traverse landscapes and emotions alike. Upcoming Podcast Series: Bharat Ki Baat, Bahri Bihari & Others.; a culturally immersive podcast exploring the rich history.

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Episode thumbnail for तीर्थाटन – धर्म, पर्यावरण और भविष्य एक यात्रा भीतर की…Ep.4 of Podcast: शास्त्रार्थ

July 18, 2025

तीर्थाटन – धर्म, पर्यावरण और भविष्य एक यात्रा भीतर की…Ep.4 of Podcast: शास्त्रार्थ

<p>तीर्थाटन – धर्म, पर्यावरण और भविष्यएक यात्रा भीतर की…भारतवर्ष में तीर्थाटन केवल पर्यटन नहीं है — यह आत्मा की यात्रा है। ‘तीर्थ’ शब्द का अर्थ ही होता है — ‘‘वह स्थान जो पार कराए’’। कोई नदी, कोई घाट, कोई पर्वत — जो मानव को संसार के शोर से निकाल कर भीतर की शांति में ले जाए। यही कारण है कि भारत में सैकड़ों तीर्थ हैं — बद्रीनाथ से रामेश्वरम्, पुरी से द्वारका तक। हर तीर्थ अपने में कोई कहानी, कोई पुरानी आस्था, कोई प्रकृति के प्रति श्रद्धा समेटे हुए है।हमारे जीवन में यात्रा का एक विशेष महत्व रहा है। लेकिन हर यात्रा तीर्थ नहीं होती। तीर्थ वह होता है जो सिर्फ शरीर को नहीं, आत्मा को भी एक पवित्र गंतव्य तक ले जाए। ‘तीर्थ’ शब्द का अर्थ है – वह स्थान जो पार लगाता है, जहाँ आकर जीवन की कठिनाइयाँ कुछ समय के लिए उतरती हैं और मन एक नए संकल्प के साथ लौटता है।भारत की संस्कृति को अगर तीर्थों की संस्कृति कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उत्तर में केदारनाथ-बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में पुरी जगन्नाथ और पश्चिम में द्वारका – ये केवल चार धाम ही नहीं हैं, बल्कि भारतीय चेतना के चार कोने हैं। इनके बीच असंख्य तीर्थ – नदियाँ, झीलें, पहाड़, वन, गुफाएँ, मंदिर, मठ, आश्रम और दरगाहें – हर आस्था को एक पवित्र राह देते हैं।हमारे पूर्वजों ने तीर्थ केवल ईश्वर से प्रार्थना करने का स्थान नहीं बनाए थे। तीर्थ सामाजिक मेलजोल का माध्यम भी थे। यही वजह है कि तीर्थ यात्रा के साथ गाँव-गाँव से लोग साथ चलते थे, रास्ते में धर्मशालाएँ बनती थीं, कथा-सत्संग होते थे, व्यापार भी चलता था और विचारों का आदान-प्रदान भी होता था।आज जब विज्ञान ने यात्रा को मिनटों में संभव कर दिया है, हवाई जहाज़ और ऑनलाइन बुकिंग ने हजारों किलोमीटर की दूरी को नापा जा सकता है, तब भी तीर्थ का महत्व कम नहीं हुआ। बल्कि तीर्थाटन अब पर्यटन से भी जुड़ गया है। पर सवाल है – क्या तीर्थ केवल घूमने की जगह है? क्या हम तीर्थ को मॉल या थीम पार्क समझ बैठे हैं? क्या हम तीर्थ के पीछे की आध्यात्मिक और सामाजिक शक्ति को भूलते जा रहे हैं?आज के इस शास्त्रार्थ लेख में हम यही देखने की कोशिश करेंगे –</p><ul><li>तीर्थ की परंपरा कहाँ से आई?</li><li>तीर्थों का स्वरूप कैसे बदलता गया?</li><li>तीर्थ और गाँव की अर्थव्यवस्था में क्या संबंध रहा?</li><li>तीर्थाटन से पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है?</li><li>डिजिटल युग में तीर्थ का भविष्य क्या होगा?</li></ul><p>और सबसे जरूरी सवाल – क्या आज भी तीर्थ हमारे भीतर कुछ बदलते हैं?</p>

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July 13, 2025

रश्मिरथी से कृष्ण-कर्ण संवाद के अंश (Dinkarji)

<p>बन सूत अनादर सहता है,कौरव के दल में रहता है,शर-चाप उठाये आठ प्रहर,पांडव से लड़ने हो तत्पर&quot;माँ का सनेह पाया न कभीसामने सत्य आया न कभी,किस्मत के फेरे में पड़ कर,पा प्रेम बसा दुश्मन के घरनिज बंधु मानता है पर को,कहता है शत्रु सहोदर को&quot;पर कौन दोष इसमें तेरा?अब कहा मान इतना मेराचल होकर संग अभी मेरे,है जहाँ पाँच भ्राता तेरेबिछुड़े भाई मिल जायेंगे,हम मिलकर मोद मनाएंगे&quot;कुन्ती का तू ही तनय ज्येष्ठ,बल बुद्धि, शील में परम श्रेष्ठमस्तक पर मुकुट धरेंगे हम,तेरा अभिषेक करेंगे हमआरती समोद उतारेंगे,सब मिलकर पाँव पखारेंगे&quot;पद-त्राण भीम पहनायेगा,धर्माधिप चंवर डुलायेगापहरे पर पार्थ प्रवर होंगे,सहदेव-नकुल अनुचर होंगेभोजन उत्तरा बनायेगी,पांचाली पान खिलायेगी&quot;आहा ! क्या दृश्य सुभग होगा !आनंद-चमत्कृत जग होगासब लोग तुझे पहचानेंगे,असली स्वरूप में जानेंगेखोयी मणि को जब पायेगी,कुन्ती फूली न समायेगी&quot;रण अनायास रुक जायेगा,कुरुराज स्वयं झुक जायेगासंसार बड़े सुख में होगा,कोई न कहीं दुःख में होगासब गीत खुशी के गायेंगे,तेरा सौभाग्य मनाएंगे&quot;कुरुराज्य समर्पण करता हूँ,साम्राज्य समर्पण करता हूँयश मुकुट मान सिंहासन ले,बस एक भीख मुझको दे देकौरव को तज रण रोक सखे,भू का हर भावी शोक सखेसुन-सुन कर कर्ण अधीर हुआ,क्षण एक तनिक गंभीर हुआ,फिर कहा &quot;बड़ी यह माया है,जो कुछ आपने बताया हैदिनमणि से सुनकर वही कथामैं भोग चुका हूँ ग्लानि व्यथा&quot;मैं ध्यान जन्म का धरता हूँ,उन्मन यह सोचा करता हूँ,कैसी होगी वह माँ कराल,निज तन से जो शिशु को निकालधाराओं में धर आती है,अथवा जीवित दफनाती है?&quot;सेवती मास दस तक जिसको,पालती उदर में रख जिसको,जीवन का अंश खिलाती है,अन्तर का रुधिर पिलाती हैआती फिर उसको फ़ेंक कहीं,नागिन होगी वह नारि नहीं&quot;हे कृष्ण आप चुप ही रहिये,इस पर न अधिक कुछ भी कहियेसुनना न चाहते तनिक श्रवण,जिस माँ ने मेरा किया जननवह नहीं नारि कुल्पाली थी,सर्पिणी परम विकराली थी&quot;पत्थर समान उसका हिय था,सुत से समाज बढ़ कर प्रिय थागोदी में आग लगा कर के,मेरा कुल-वंश छिपा कर केदुश्मन का उसने काम किया,माताओं को बदनाम किया&quot;माँ का पय भी न पीया मैंने,उलटे अभिशाप लिया मैंनेवह तो यशस्विनी बनी रही,सबकी भौ मुझ पर तनी रहीकन्या वह रही अपरिणीता,जो कुछ बीता, मुझ पर बीता&quot;मैं जाती गोत्र से दीन, हीन,राजाओं के सम्मुख मलीन,जब रोज अनादर पाता था,कह &#39;शूद्र&#39; पुकारा जाता थापत्थर की छाती फटी नहीं,कुन्ती तब भी तो कटी नहीं&quot;मैं सूत-वंश में पलता था,अपमान अनल में जलता था,सब देख रही थी दृश्य पृथा,माँ की ममता पर हुई वृथाछिप कर भी तो सुधि ले न सकीछाया अंचल की दे न सकी&quot;पा पाँच तनय फूली फूली,दिन-रात बड़े सुख में भूलीकुन्ती गौरव में चूर रही,मुझ पतित पुत्र से दूर रहीक्या हुआ की अब अकुलाती है?किस कारण मुझे बुलाती है?&quot;क्या पाँच पुत्र हो जाने पर,सुत के धन धाम गंवाने परया महानाश के छाने पर,अथवा मन के घबराने परनारियाँ सदय हो जाती हैंबिछुड़ों को गले लगाती हैं?&quot;कुन्ती जिस भय से भरी रही,तज मुझे दूर हट खड़ी रहीवह पाप अभी भी है मुझमें,वह शाप अभी भी है मुझमेंक्या हुआ की वह डर जायेगा?कुन्ती को काट न खायेगा?&quot;सहसा क्या हाल विचित्र हुआ,मैं कैसे पुण्य-चरित्र हुआ?कुन्ती का क्या चाहता हृदय,मेरा सुख या पांडव की जय?यह अभिनन्दन नूतन क्या है?केशव! यह परिवर्तन क्या है?&quot;मैं हुआ धनुर्धर जब नामी,सब लोग हुए हित के कामीपर ऐसा भी था एक समय,जब यह समाज निष्ठुर निर्दयकिंचित न स्नेह दर्शाता था,विष-व्यंग सदा बरसाता था&quot;उस समय सुअंक लगा कर के,अंचल के तले छिपा कर केचुम्बन से कौन मुझे भर कर,ताड़ना-ताप लेती थी हर?राधा को छोड़ भजूं किसको,जननी है वही, तजूं किसको?&quot;हे कृष्ण ! ज़रा यह भी सुनिए,सच है की झूठ मन में गुनियेधूलों में मैं था पड़ा हुआ,किसका सनेह पा बड़ा हुआ?किसने मुझको सम्मान दिया,नृपता दे महिमावान किया?&quot;अपना विकास अवरुद्ध देख,सारे समाज को क्रुद्ध देखभीतर जब टूट चुका था मन,आ गया अचानक दुर्योधननिश्छल पवित्र अनुराग लिए,मेरा समस्त सौभाग्य लिए&quot;कुन्ती ने केवल जन्म दिया,राधा ने माँ का कर्म कियापर कहते जिसे असल जीवन,देने आया वह दुर्योधनवह नहीं भिन्न माता से हैबढ़ कर सोदर भ्राता से है&quot;राजा रंक से बना कर के,यश, मान, मुकुट पहना कर केबांहों में मुझे उठा कर के,सामने जगत के ला करकेकरतब क्या क्या न किया उसनेमुझको नव-जन्म दिया उसने&quot;है ऋणी कर्ण का रोम-रोम,जानते सत्य यह सूर्य-सोमतन मन धन दुर्योधन का है,यह जीवन दुर्योधन का हैसुर पुर से भी मुख मोडूँगा,केशव ! मैं उसे न छोडूंगाहिंदी के ओजस्वी कवि रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी रचना ‘रश्मिरथी’ </p>

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July 4, 2025

धरा, धर्म और धरती: शास्त्रार्थ में पर्यावरण चेतना(Ep.4) Podcast: Shastrarth(S1)

Amitbhanu discusses environmental consciousness in ancient scriptures, exploring how Vedic traditions valued nature and highlighting the need to revive practices that protect the earth.

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